
सुबह के 8 बजे।
मिहिका की नींद अपने चेहरे पर आने वाली तेज सूरज की किरणों से खुली। वो अपनी आँखें खोलती है, तो उसके जहन में एक बार फिर से कल रात की सारी यादें आने लगती हैं, जिसे याद करते हुए वो अंदर से सहम जाती है और वो धीरे-धीरे खुद को खुद की ही बाहों में भरने को हुई, जब दर्द की तेज लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ गई और उसके मुँह से एक दर्द भरी चीख निकल गई। उसकी आँखें आँसुओं से भीग गईं। वो सिसकते हुए बोली, "हे भगवान! ना जाने किस पाप की सजा भुगत रही हूँ। क्या मिला आपको, भगवान जी, मुझे इस दुनिया में भेजकर? पता नहीं, लेकिन मुझे सिवाय तकलीफ के कुछ नही मिला। मेरे पापा हों, मेरी सौतेली माँ और बहन हों, सबने मुझे तकलीफ दी। उस वक्त मेरे अंदर एक उम्मीद थी कि मेरा जो पति होगा, वो मुझे बहुत प्यार करेगा, लेकिन मेरी वो उम्मीद भी इस कदर टूटी कि कोई उम्मीद ही नहीं रह गई। क्या आपको जरा भी तरस नहीं आता मुझपर?" ये कहते हुए वो फफक-फफक कर रो पड़ती है।











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