
सुबह की हल्की धूप खिड़कियों से छनकर अर्थ के कमरे में फैल रही थी, कमरे में एक गहरी शांति पसरी हुई थी, सिर्फ़ इति की हल्की साँसों की आवाज़ और बाहर चहकते परिंदों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। इति की आँखें धीरे-धीरे खुलने लगी और उसे अपने शरीर पर कुछ भारी और सख़्त-सा महसूस हुआ, जैसे वो किसी हार्ड चीज़ पर लेटी हो। उसकी पलकें अभी भी नींद से भारी थीं उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें पूरी तरह खोलीं, लेकिन कुछ पल तक सब कुछ धुंधला-धुंधला नज़र आया पर धीरे-धीरे उसकी नजरें साफ़ हुईं, और फिर वो अचानक उसकी नजरें अपने सामने के नजारे पर टिक गई, —अर्थ का चेहरा।










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