ईवा जैसे पत्थर सी हो गई थी। उसके गालों पर गर्म आँसू सोने की फर्श पर गिर रहे थे, जिन पर ऊपर की लाइट की चमक पड़ रही थी। उसने हल्की, सूखी हँसी के साथ खुद से कहा, “हाँ… वही तो हूँ ना मैं… उसकी mistress।” आवाज़ इतनी धीमी थी कि खुद उसे भी ठीक से सुनाई नहीं दी। “तो फिर दर्द क्यों हो रहा है मुझे? जब सब कुछ तय है, जब मेरी जगह वही है, तो ये आँसू क्यों निकल रहे हैं?” उसने अपनी हथेली से आँसू पोंछे, पर अगले ही पल वे फिर बह निकले, अश्विन की बातें, उसका तरीका, उसका नियंत्रण — सब कुछ उसे एक पिंजरे में बाँध चुका था। लेकिन अजीब बात यह थी कि उसी पिंजरे में उसने कभी थोड़ी सुरक्षा भी महसूस की थी। शायद इसलिए, उस पिंजरे का टूटना भी उसे डराता था।
वो खुद को संभाल ही रही थी कि तभी उसके पीछे से अश्विन की आवाज़ आई — ठंडी, नपे-तुले स्वर में,







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