कमरे के भीतर की तपन, वो जूनून और जिस्मानी तड़प की सारी परतें अब भी शाशा के वजूद पर छपी हुई थीं। उसकी गर्दिश करती सांसें और देह पर यश की छुअन के लाल निशान उसके बागी होने की गवाही दे रहे थे। यश ने बहुत ही नर्मी से शाशा की आंसुओं से भरी आँखों को देखा, अपने दोनों हाथों के प्याले में उसके नम चेहरे को भरा और उसकी आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाया, "बेबी, तुम फिक्र मत करो। तुम मेरी ही रहोगी... हमेशा। बस तुम अब देखती जाओ कि आगे-आगे क्या होता है।"
यह कहकर यश ने एक आखिरी गहरी नज़र शाशा पर डाली और कमरे की कुंडी खोलकर चुपचाप बाहर निकल आया।








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