कुछ देर बाद शादी के मंडप के पास वाले खुले हिस्से में कबीर और शाशा बैठे हुए थे। शाशा का लहंगा फैला हुआ था और दो मेहंदी वाली लड़कियाँ उसके पैरों पर डिज़ाइन बना रही थीं। हल्की खुशबू वाली मेहंदी की महक हवा में घुल रही थी। शाशा की आँखें थकी हुई थीं, लेकिन वो जबरन मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। कबीर उसके बगल में बैठा था, सूट में लुकिंग हैंडसम, पर उसका चेहरा उदास और बेजान था।
“तुम ठीक तो हो ना?” शाशा ने धीरे से पूछा, अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए।








Write a comment ...