दो दिन बाद, शर्मा मेंशन का लॉन हल्दी की चमक से भर गया था। सुबह के दस बजते-बजते पूरा जगह पीले रंग में रंग चुका था। गेंदे की मालाएँ हर तरफ़ लटक रही थीं, पीले दुपट्टे छत पर लहरा रहे थे, और ज़मीन पर पीली चादर बिछी हुई थी। हल्दी की महक हवा में घुली हुई थी – ताज़ी पिसी हल्दी, चंदन और फूलों की। डीजे पर हल्का पंजाबी म्यूजिक बज रहा था, औरतें गा-बजाकर नाच रही थीं।
हल्दी की रस्म सबसे पहले कबीर की हुई। वो पीले कुर्ते में बैठा था, चारों तरफ़ फैमिली ने उसे घेर रखा था। अनीता आंटी ने सबसे पहले हल्दी लगाई, फिर बाकी रिश्तेदारों ने। कबीर हँस रहा था, सबके साथ मज़ाक कर रहा था। शाशा दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार यश को ढूँढ रही थीं।








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