दोपहर के बारह बज चुके थे। शर्मा मेंशन का मुख्य हॉल हलचल से भरा था। शादी की तैयारियाँ जोरों पर थीं – लिस्ट बन रही थीं, डिज़ाइनर के अपॉइंटमेंट्स फिक्स हो रहे थे। कबीर ने सुझाव दिया कि आज ब्राइडल लहंगा और शेरवानी की शॉपिंग कर ली जाए। “चलो, आज ही सबसे बड़ा काम निपटा लें,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। शाशा ने हामी भरी, रिया तो पहले से ही एक्साइटेड थी – “फाइनली! मैं तो महीनों से इंतज़ार कर रही हूँ।”
यश भी शामिल हो गया। “मैं भी चलता हूँ, भाई। कुछ अच्छा सुझाव दे दूँगा,” उसने कैजुअल अंदाज़ में कहा, लेकिन उसकी नज़र एक पल को शाशा पर रुकी – वो नज़र जो सिर्फ़ शाशा समझ सकती थी। शाशा ने नज़रें झुका लीं, लेकिन दिल की धड़कन तेज़ हो गई।








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